सरकारी विद्यालयों में शिक्षक निजी विद्यालयों के मुकाबले अधिक योग्य होते हैं,फिर भी लोग सरकारी विद्यालयों में अपने बच्चों को क्यों नहीं पढ़ाते?


भारत के उलट ऑस्ट्रेलिया के सरकारी स्कूल क्यों बेहतर है निजी स्कूलों से?
मेलबर्न ऑस्ट्रेलिया से पत्रकार एसपी चौहान की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट-
भारत और ऑस्ट्रेलिया की शिक्षा व्यवस्था की तुलना करने पर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर क्यों ऑस्ट्रेलिया के सरकारी स्कूल आम लोगों की पहली पसंद हैं, जबकि भारत में सरकारी स्कूल अक्सर गरीब और ग्रामीण वर्ग तक सीमित होकर रह जाते हैं। यह बात अलग है कि सरकारी विद्यालयों में शिक्षक निजी विद्यालयों के शिक्षकों से योग्यता के मामले में कहीं बेहतर होते हैं।
      ऑस्ट्रेलिया में लगभग 63प्रतिशत छात्र सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, जबकि भारत में भी सरकारी स्कूलों में बड़ी संख्या में छात्र पढ़ते हैं, लेकिन मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग तेजी से निजी स्कूलों की ओर भाग रहा है। यह अंतर केवल आर्थिक नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता, जवाबदेही और सोच का भी अंतर है।
     जो भारतीय ऑस्ट्रेलिया में रहकर अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं उनसे बात करने पर जो जानकारी हुई वह यह है कि रटने वाली शिक्षा बनाम समझ आधारित शिक्षा।
भारत की शिक्षा व्यवस्था लंबे समय तक परीक्षा-केंद्रित रही है। यहाँ अंक और बोर्ड रिजल्ट शिक्षा की गुणवत्ता का पैमाना माने जाते हैं।
वहीं ऑस्ट्रेलिया में शिक्षा का केंद्र महत्वपूर्ण सोच, समस्या समाधान और प्रैक्टिकल नॉलेज पर आधारित है। वहाँ बच्चों को केवल उत्तर याद नहीं करवाए जाते, बल्कि सोचने और तर्क करने की ट्रेनिंग दी जाती है।
 शिक्षक की भूमिका-
भारत में सरकारी स्कूलों के शिक्षक अक्सर गैर-शैक्षणिक सरकारी कार्यों—जैसे चुनाव ड्यूटी, सर्वे और प्रशासनिक काम—में लगाए जाते हैं। जबकि ऑस्ट्रेलिया में शिक्षक का मुख्य काम केवल पढ़ाना होता है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित नहीं होती। दोनों देशों में जवाबदेही का भी अंतर है।
ऑस्ट्रेलिया में स्कूलों की नियमित निगरानी, प्रदर्शन मूल्यांकन और शिक्षा मानकों का सख्त पालन करना होता है। जबकि भारत में नीति अच्छी होने के बावजूद उसका क्रियान्वयन कमजोर रहता है।संसाधन के मामले में ऑस्ट्रेलिया के सरकारी स्कूलों में आधुनिक क्लासरूम, डिजिटल शिक्षा, खेल मैदान, लाइब्रेरी और साइंस लैब सामान्य बात है।
भारत के कई सरकारी स्कूल अभी भी बुनियादी सुविधाओं—शौचालय, साफ पानी, पर्याप्त कक्षाओं—के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या भारत में ऑस्ट्रेलिया के मुकाबले चार गुना से अधिक रहती है। ऑस्ट्रेलिया में ओपन कक्षाएं है लेकिन भारत में हर क्लास के लिए अलग-अलग कमरे होते हैं।
एक सामाजिक धारणा यह भी है कि ऑस्ट्रेलिया में सरकारी स्कूल में पढ़ना सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ा नकारात्मक विषय नहीं है।जबकि भारत में “सरकारी स्कूल” को अक्सर कम गुणवत्ता से जोड़ा जाता है।
भारत पीछे क्यों छूटता दिखता है इसके विषय में विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की सबसे बड़ी चुनौती “नीति की कमी” नहीं बल्कि “नीति के क्रियान्वयन की कमी” है।
नई शिक्षा नीति ने बदलाव का रास्ता दिखाया है, लेकिन जमीनी असर अभी सीमित है।
     यह बात भी सत्य है कि भारत की आबादी ऑस्ट्रेलिया की आबादी से बहुत अधिक है। इसका मतलब यह नहीं कि आबादी की आड़ लेकर हम छुप जाए और जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लें।भारतीय छात्रों को भी अच्छी शिक्षा व सुविधा देना सरकार की जिम्मेदारी है कथा हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह भी अपना सकारात्मक/सहयोगात्मक रुख रखें सरकारी विद्यालयों की ओर।
भारत क्या सीख सकता है?
शिक्षक को गैर-शैक्षणिक कामों से मुक्त करना,रटने की जगह कौशल आधारित शिक्षा देना,सरकारी स्कूलों का बुनियादी ढांचा मजबूत करना,जवाबदेही तय करना तथा
स्थानीय स्तर पर शिक्षा की निगरानी बढ़ाना।
निष्कर्ष यह है कि ऑस्ट्रेलिया की शिक्षा व्यवस्था इसलिए बेहतर दिखती है क्योंकि वहाँ सरकारी शिक्षा को “गरीबों की व्यवस्था” नहीं, बल्कि “राष्ट्र निर्माण का आधार” माना जाता है।
    भारत में जब तक सरकारी स्कूलों में मध्यम वर्ग का भरोसा वापस नहीं लौटेगा, तब तक शिक्षा में वास्तविक समानता लाना कठिन रहेगा।
    गाज़ियाबाद और दिल्ली- एनसीआर के कई सरकारी स्कूलों में पिछले कुछ वर्षों में बुनियादी ढांचे में सुधार जरूर हुआ है—स्मार्ट क्लास, डेस्क, पेंटिंग और भवन निर्माण—लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता पर अभी भी सवाल बने हुए हैं।अभिभावकों का एक बड़ा वर्ग बदलाव के बाद भी आज भी सरकारी स्कूल की बजाय निजी स्कूलों को प्राथमिकता देता है।
स्थानीय अभिभावकों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षक मौजूद होने के बावजूद पढ़ाई की निरंतरता और व्यक्तिगत ध्यान की कमी महसूस होती है। दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया में सरकारी स्कूल समुदाय-आधारित मॉडल पर चलते हैं, जहाँ अभिभावकों की भागीदारी भी अधिक होती है। स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावक स्कूल की प्रबंध कमेटी में होते हैं और जरूरत पड़ने पर स्कूल के विकास के लिए फंड जुटाते हैं केवल सरकार के भरोसे नहीं रहते।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में समस्या संसाधनों की कमी भर नहीं, बल्कि जवाबदेही और शिक्षण पद्धति की भी है।अगर सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता में सुधार हो जाए तो लाखों परिवारों का निजी स्कूलों पर आर्थिक बोझ कम हो सकता है।
      इस विश्लेषण को लिखने से पहले ऑस्ट्रेलिया के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले एशियाई छात्रों से बात की गई तो वह बताते हैं कि यहां स्कूल में एडमिशन पाने के लिए सिफारिश की नहीं बल्कि योग्यता पैमाना है और यह पैनामा पिछले वर्ष की मार्कशीट नहीं बल्कि एडमिशन के लिए लिखित परीक्षा होती है जो एडमिशन का आधार बनती है। खुशी की बात यह है कि विद्यालयों में एडमिशन के लिए होने वाली परीक्षा पास करने वालों में भारतीय छात्रों की संख्या सबसे अधिक रहती है इसके बाद चीनी, श्रीलंकाई ,पाकिस्तानी, कोरियाई आदि होते हैं। यहां एक कक्षा में 20-25 से ज्यादा छात्र नहीं होते तथा शिक्षक भी हर छात्र पर नजर रखते हैं और उन्हें उचित सलाह देते हैं। लेकिन भारत में ऐसा नहीं है वहां छात्रों की संख्या एक कक्षा में औसतन 60-70 होती है। ऑस्ट्रेलिया में बच्चों के कंधों  का भी ध्यान रखा जाता है तथा बस्ते बोझिल नहीं होते, स्कूल में छात्रों लिए अलग-अलग अलमारी के सेल्फ होते हैं।

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